आधुनिक मनुष्य ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए प्रकृति का दोहन शुरू कर दिया। जंगलों की कटाई, पहाड़ों का विनाश, नदियों का प्रदूषण और जीव-जंतुओं के आवासों को नष्ट करना इसी संघर्ष के दृष्टांत हैं। मनुष्य ने यह भूल दिया कि प्रकृति एक संतुलित प्रणाली है। जब मनुष्य इस संतुलन को भंग करता है, तो प्रकृति अपना रूप बदलकर 'विनाशकारी' बन जाती है। 'मनुष्य बनाम प्रकृति' का यह संघर्ष मनुष्य के स्वार्थ और अहंकार का परिणाम है।