Daink Jagran: Epaper
हमारे त्योहार जीवन की खुशियों का प्रतीक थे। दीवाली पर मिट्टी के दीए जलते थे और परिवार के साथ मिलकर पूजा होती थी। आज वही दीपावली 'पटाखों' से ज्यादा 'सोशल मीडिया पोस्टिंग' तक सीमित हो गई है। बधाई देने के लिए घर जाने का बजाय व्हाट्सएप मैसेज भेज दिया जाता है। त्योहारों का वह असली आनंद, वह खास महक अब कहीं खो सी गई है। हम त्योहार मना तो रहे हैं, लेकिन अब वह 'अनुभूति' नहीं है, बस एक 'औपचारिकता' बनकर रह गई है।
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